सोमवार, अगस्त 13, 2012

कुछ कविता सी..


आज कुछ कहने को जी चाहता है,
इन फुहारोँ मे भीगने को जी चाहता है.
तुम जो ना हो साथ मेरे,
बस अब इन हवाओँ से खेलने को जी चाहता है.


शायद तुम्हे याद होगीँ...
वो बचपन की बारिशेँ...जब हम साथ भीगा करते थे...
बारिश से हुई गीली धूल को,
नाजुक सी हथेली पर थाम कर,
मुझ पर उड़ाने की तुम्हारी नादान कोशिशेँ..
अब तो बस ये याद कर मुस्कराने को जी चाहता है...

शनिवार, जून 09, 2012

UP Result 2012-आधी हकीकत आधा फ़साना

        चार दिन  पहले यूपी बोर्ड के  12वीं का और कल 10वीं का रिज़ल्ट आया. रिज़ल्ट प्रतिशत और  देख के दिमाग़ मे खुजली होने लगी ..यूपी बोर्ड मे इतने प्रतिशत छात्र कभी भी  पास नही हुए थे जितना इस बार पास हुए हैं. 12 वीं मे रिज़ल्ट मे इस बार लगभग 4% की बढ़ोतरी  हुई है जबकि 10वीं मे तकरीबन 13% की. वैसे इस देश मे सब कुछ बढ़  रहा है..जनसंख्या, भ्रष्टाचार, महंगाई , बेरोजगारी ..... और रुपया  भी 54-55-56 हो रहा है (डालर के मुकाबले) पर उसकी वैल्यू घट रही है जैसे  हमारे  यूपी  में  रिजल्ट %  बढ  रहा है  पर  शिक्षा की वैल्यू  घट  रही है .....मैं ऐसा नहीं कह रहा की ये हाल समूचे प्रदेश का है पर  आस -पास के  अधिकतर जिलों में ऐसा ही हो रहा है....12वी  के परिणामों पर गौर  करें तो  पता चलता है कि पुरे प्रदेश में 800 ऐसे स्कूल हैं जहाँ   एक भी बच्चे  फेल  नहीं हुए  है... और  370 ऐसे स्कूल जिसका प्रतिशत 100 With 1st  class रहा है .. सभी के सभी  60% से  अंक प्राप्त किये है ..और इनमे से अधिकतर स्कूल पिछड़े जिलों के हैं...ताज्जुब हो रहा है कि  अचानक से हमारे अध्यापक इतने जिम्मेदार कैसे हो गये ..??  छात्र इतने गंभीर हो गये......कि  इनका रिजल्ट   इतना अच्छा  आया कि  लखनऊ और कानपूर जैसे शिक्षा के क्षेत्र में जानेमाने जिले भी रैंकिंग  (जिलेवार ) में पिछले साल की तुलना में क्रमशः 14वीं और 20 वीं पायदान   से 45वीं और 60वीं पायदान  पर लुढ़क  गये. 
        10वीं के रिजल्ट की बात करें तो... इस बार  छात्रों  को  खूब  नंबर मिले   हैं... नंबरों  की बाढ़ सी आ गयी है ..हालाँकि  इसका सबसे बड़ा  कारण  है की उत्तर प्रदेश की हाई स्कूल के परीक्षा में पहली बार से  "सतत और व्यापक मूल्यांकन प्रणाली" लागू की गयी  है .. एकदम सीबीएसई की  तर्ज पर ... इस  बार 30 नम्बर के मुफ्त मे मिले प्रयोगात्मक परीक्षा के नाम  पर.... और प्रयोगात्मक परीक्षा के नाम पर  रुपये  लिए गये ..हालांकि प्रयोगात्मक परीक्षा के नाम पर  रुपये  लेने  का किस्सा बहुत पुराना  है ..
          ऐसा रिजल्ट देख के मन में सवाल  उठता  है  कि  क्या  वाकई  में इतने बच्चे पास हुए हैँ ??...क्या अब हम यह मान  लें की हमारी शिक्षा प्रणाली  सुधर चुकी है..??  लेकिन नहीं.... इसके पीछे  की हकीकत  कुछ  और  ही है...नक़ल माफियाओं और स्कूल  संचालकों की बोर्ड में सेट्टिंग  इस हद  तक बढ़  गयी है वे  हो चाहे तो किसी को भी किसी की जगह परीक्षा  में बैठा हैं.....और फिर बोर्ड से मनचाहा नम्बर ले सकते हैं ....नक़ल माफियाओं  का खेल  प्रति छात्र  500  रुपये से 2000 तक का होता है... और ये परीक्षा  में  बोल बोल कर   प्रश्न हल  करवाते  हैं और गणित  और विज्ञानं  के प्रश्नों को  तो ब्लैक बोर्ड  पर....  अगर आप  लिखने  में असमर्थ  हैं तो उसकी भी व्यवस्था है आपकी परीक्षा कोई और देगा और आपको देने होंगे मात्र  5000 रुपये. ...बड़ी ही अच्छी  व्यवस्था बन गयी है पास होने की :(    हालाँकि मै  एक बार फिर से कह रहा हूँ कि  ये हालात  हर जगह की नहीं है  पर  मेरे और  आस पास के जिलों(आजमगढ़ ,मऊ ,बलिया ,गाजीपुर.....  ) के अधिकतर स्कूलों में यही हो रहा है.


      जब मैंने फेसबुक पर लिखा कि -"आज का रिजल्ट देख के हम लोंगो की मार्कशीट शर्म के मारे  झेंप जाये" 
 तो एक  सज्जन  ने मैसेज  में लिखा कि - क्यों  नए ज़माने  के बढ़ते प्रतिशत को देख के  चिंता  हो रही है ??"
मैंने कहा कि - नहीं ....मुझे चिंता  इस बात की हो रही है  कि  हमारी शिक्षा व्यवस्था  कहाँ जा रही है ..!!
तो कहने लगे - शिक्षा व्यवस्था गयी टैबलेट  लेने ....सभी पास हैं खुशी  मनाओ." 
   -अरे भाई किस बात की ख़ुशी मनाये ..??
         ऐसे बच्चों के पास होने पर जिनका दिन  क्रिकेट  और  राते  चाईना मोबाईल से भोजपुरी  गानों में  व्यस्त  रहती  थी ....और  परीक्षा  490 नंबर  लाता  है... घर  वाले भी खुश  हैं...उन्हें  लगता है कि  स्कूल  ने 500  रुपये लिए  थे....  बेकार नही किये ...उनके बच्चे का परसेंटेज  बन गया ....लेकिन क्या बेकार हुआ है ये बात    उनके समझ में अभी नहीं आएगी .
          
     एक जमाना था जब रिजल्ट मुख्यरूप से अख़बारों  में निकलते थे....और गाँव का  कोई  व्यक्ति  शहर जा कर रात में अख़बार लाता ..और रात के अंधरे में टार्च  के  सहारे रोलनंबर ढूंढे जाते ...और बड़ी गौर से देखा जाता कि किस  रोलनंबर के आगे  F(first ) लिखा है या S(second ),या T(third ) लिखा  है ....बड़ी मुश्किल से गाँव का कोई लड़का F की लिस्ट में दिख जाता .... और कुछ लड़कों का रोल नंबर उस अख़बार में नहीं होता...उन पर क्या बीतती  रही होगी  ये मै नहीं समझ सकता......लेकिन आज के समय  में दिन में  भी टार्च  ले कर निकले  तो  F(फेल) आपको बड़ी मुश्किल से 2-4 गाँव  ढूढने  पर शायद ही कोई मिल जाये....हर गाँव ,हर घर खुश  है....लेकिन   कब तक..??  जब तक नक़ल माफिया का साथ है ??
क्या फर्क पड़ता है ..अब तो ऐसे माफियाओं का साथ हमेशा  साथ रहता है ...अच्छे  नंबरों  की मार्कशीट ले कर रखिये ...दुसरे माफिया 2 -4  लाख  रुपये ले कर आपको नौकरी भी दिला  देंगे ...इंतनी तो व्यवस्था बन ही गयी है हमारे सिस्टम में..?
  
      दिखावे के नजरिये से हम बहुत  आगे निकल चुके हैं ...एक   पड़ोसी  बड़े  शान  से कहता है कि मेरे बेटे का 85 %  है...अब दूसरा पडोसी पता  करता  है  कि  इसने एडमिशन कहाँ से कराया था ... मै   भी  वहीं से  कराऊंगा ..और अगर  उसने 500 दिए  थे तो मै  1000 दूँगा ... पर  मेरे बेटे का 86% तो आना ही चाहिए....इससे  कम  आया तो नाक  कट  जाएगी जनाब   की..!!

मंगलवार, फ़रवरी 28, 2012

बिहार यात्रा - बिछड़े यार मिले !!

      पुरानी बात है. दादा जी कोलकाता में नौकरी करते थे, और पिता जी वहीँ रह कर अपनी पढ़ाई  करते थे. 1983-84 में दादा जी रिटायर होने के बाद सभी वापस गाँव आ गये. गाँव आने के बाद, पिता जी को अपने दोस्तों जुड़े रहने का एकमात्र जरिया थी "चिठ्ठियाँ". उस समय फोन आम घरों से कोसों दूर था. अपने दोस्तों से जुड़े रहने के लिए पिता जी अपने दोस्तों को खूब  पत्राचार करते और बदले में पायी उन चिठ्ठियाँ को सहेज कर रख लेते. उन्ही दोस्तों में से पिता जी के एक ख़ास दोस्त हुआ करते थे "मसूद आलम अंसारी." पिता जी जब भी अपनी कोलकाता की यादों को हम लोंगो के साथ बाटतें  तो मसूद जी का नाम जरूर लेते. 
      पिछले साल में पिता जी की आलमारी की सफाई के  दौरान, आलमारी से पिता जी की डायरी मेरे हाथ लग गयी. मैं खुरापाती इंसान, डायरी के एक-एक पन्ने को पलट के देखने लगा कि पिता जी की डायरी में क्या-क्या  है. उनकी डायरी में कुछ सामान्य ज्ञान की बातें, उन दिनों के क्रिकेटरों के रिकार्ड, कुछ कवियों की कवितायेँ, एक-दो स्कूली जीवन के नाटक, कुछ खर्चो के हिसाब, अख़बारों कुछ कटिंग और दो चिठ्ठियाँ  थी. ये दो  चिठ्ठियाँ  मसूद जी ने पिता जी को लिखी थी. शायद ये दोनों आखिरी चिठ्ठी रही होगी उनकी, तभी तो आज तक सुरक्षित पड़ी थी.
     पहली चिठ्ठी जो है, वो जून 1985 में लिखी गयी थी, जिसकी स्कैन कॉपी यहाँ लगा रहा हूँ.




और एक दूसरी चिठ्ठी मई 1986 में भेजी गयी थी.


      इसके बाद कुछ विषम परिस्थितियों के बाद ये चिठ्ठियाँ  का सिलसिला ऐसा  टुटा फिर जुड़ ना पाया. चिठ्ठियाँ  पढ़ने  के बाद मैंने सोचा, लगभग 25  वर्षों से मुरझाये हुए दोस्ती के इस रिश्ते को फिर से हरा भरा जाये. चिठ्ठी पर जो पता था उस पर पिता जी से पूछताछ  की तो पता चला की उस पते पर अब कोई दूसरा रहता है. वे लोग भी कोलकाता छोड़  चूके हैं. मै फिर  डायरी को उलटना-पलटना शुरू किया ताकि कोई सुराग मिल सके.  डायरी से मुझे उनके पैतृक गाँव का पता मिला. जो बिहार राज्य के समस्तीपुर जिले के  विद्यापति  नगर का  एक गाँव मलकलीपुर था. 
      अब वक्त था, कोई समस्तीपुर का कोई मिले जिससे आगे कि जानकारी हासिल की जाये. ऐसे में फेसबुक मित्र निखिल आनंद गिरि काम आये जो समस्तीपुर के है. अभी हाल में ही उनकी शादी में समस्तीपुर जाना हुआ. शादी के बाद हम लोग  उन्हें ढूढ़ने के लिए उनके पैतृक गाँव मलकलीपुर  पहुँचे. हम लोग विद्यापति नगर एक स्थानीय व्यक्ति को लेकर उनके गाँव मलकलीपुर पहुँचे. कहते हैं ना."जब कोई अच्छा काम करो तो किस्मत भी साथ देती है. पहला ही घर, जहाँ हम पूछने के लिए रुके सौभाग्य से वहीँ उनका ही घर निकला. लेकिन घर पर सिर्फ उनकी बहू और उनकी बहन रहती हैं. पूछने पर पता चला कि वे अब नागपुर में शिफ्ट हो गये हैं.  हमने वहाँ से उनका मोबाइल नंबर लिया और पिता जी से बात करायी. एक सिल्वर जुबली के बाद दोनों मित्र बातें कर के बहुत खुश हैं.

सोमवार, फ़रवरी 27, 2012

बिहार यात्रा वाया समस्तीपुर

        बिहार(समस्तीपुर) से लौटे २ दिन हो गये हैं. पर अभी समस्तीपुर की ही यादों में खोया हूँ , वहाँ की बोली, वहाँ के लोग, और वहाँ के लोंगो  से मिला  असीम प्यार मुझे हर पल याद आ रहा है.
समस्तीपुर एक भीड़-भाड़ वाला शहर, मगर लोंगो की जिंदगी में वो भाग-दौड़ नहीं जो अन्य शहरों  में देखने को मिलती है. बड़े ही शांत और हँसमुख लोग जो पूरी तरह से खुल के बातें करते हैं.
समस्तीपुर  की बोली में एक अलग तरह की मिठास भरी है जो आपके मन को मोह लेती है. हिंदी हो या अंग्रेजी, यहाँ अधिकतर शब्दों में "ऐ" का उच्चारण होता है जिसे सुन कर आपको "बहुते अच्छा लगेगा."
जैसे कार धुलाई करने वाला कार को धोने के बाद बोला -"देखिये ना, अब करवा का लूकवे(LOOK) चेंज हो गया"
एक सज्जन घड़ी देख कर बोले- "अभी तो नाइने(NINE) बज रहा है."
'व' का उच्चारण 'भ' में किया जाता है अर्थात यहाँ वेलकम नहीं "भेलकम" किया जाता है और यहाँ "दिल भाले दुल्हनिया ले जाते हैं."
'ड़'  का उच्चारण 'र' में किया जाता है मतलब "थोरा थोरा खाइए ना" 
कहीं कहीं तो अंग्रेजी के कुछ उच्चारण तो पूरी तरह से भिन्न सुनने को मिल  जाते हैं पर बातें आपको समझ में आ ही जाती हैं. 
जैसे कार धुलाई करने वाला बोला- "देखिया ना, धुलने के बाद कार आउटे(ODD) नहीं लग रही है."
और एक सज्जन निखिल से बात करते हुए बोले "कभी हमें जी टीवी का  प्रोसेसर(PRODUCER ) से मिलवाइए."
सबसे दिलचस्प मुझे ये लगी कि‍ यहाँ के लोंगो की बातो में "मैं" कहीं नजर नहीं आया यहाँ सभी "हम" लगा कर बाते करते हैं जो दिल को छू लेता है.
समस्तीपुर की मक्के की रोटी और मछली चावल अभी भी याद आ रहे  हैं. याद भी क्यूँ ना आये पहली बार जो मक्के की रोटी खाने को मिली थी.