मंगलवार, फ़रवरी 28, 2012

बिहार यात्रा - बिछड़े यार मिले !!

      पुरानी बात है. दादा जी कोलकाता में नौकरी करते थे, और पिता जी वहीँ रह कर अपनी पढ़ाई  करते थे. 1983-84 में दादा जी रिटायर होने के बाद सभी वापस गाँव आ गये. गाँव आने के बाद, पिता जी को अपने दोस्तों जुड़े रहने का एकमात्र जरिया थी "चिठ्ठियाँ". उस समय फोन आम घरों से कोसों दूर था. अपने दोस्तों से जुड़े रहने के लिए पिता जी अपने दोस्तों को खूब  पत्राचार करते और बदले में पायी उन चिठ्ठियाँ को सहेज कर रख लेते. उन्ही दोस्तों में से पिता जी के एक ख़ास दोस्त हुआ करते थे "मसूद आलम अंसारी." पिता जी जब भी अपनी कोलकाता की यादों को हम लोंगो के साथ बाटतें  तो मसूद जी का नाम जरूर लेते. 
      पिछले साल में पिता जी की आलमारी की सफाई के  दौरान, आलमारी से पिता जी की डायरी मेरे हाथ लग गयी. मैं खुरापाती इंसान, डायरी के एक-एक पन्ने को पलट के देखने लगा कि पिता जी की डायरी में क्या-क्या  है. उनकी डायरी में कुछ सामान्य ज्ञान की बातें, उन दिनों के क्रिकेटरों के रिकार्ड, कुछ कवियों की कवितायेँ, एक-दो स्कूली जीवन के नाटक, कुछ खर्चो के हिसाब, अख़बारों कुछ कटिंग और दो चिठ्ठियाँ  थी. ये दो  चिठ्ठियाँ  मसूद जी ने पिता जी को लिखी थी. शायद ये दोनों आखिरी चिठ्ठी रही होगी उनकी, तभी तो आज तक सुरक्षित पड़ी थी.
     पहली चिठ्ठी जो है, वो जून 1985 में लिखी गयी थी, जिसकी स्कैन कॉपी यहाँ लगा रहा हूँ.




और एक दूसरी चिठ्ठी मई 1986 में भेजी गयी थी.


      इसके बाद कुछ विषम परिस्थितियों के बाद ये चिठ्ठियाँ  का सिलसिला ऐसा  टुटा फिर जुड़ ना पाया. चिठ्ठियाँ  पढ़ने  के बाद मैंने सोचा, लगभग 25  वर्षों से मुरझाये हुए दोस्ती के इस रिश्ते को फिर से हरा भरा जाये. चिठ्ठी पर जो पता था उस पर पिता जी से पूछताछ  की तो पता चला की उस पते पर अब कोई दूसरा रहता है. वे लोग भी कोलकाता छोड़  चूके हैं. मै फिर  डायरी को उलटना-पलटना शुरू किया ताकि कोई सुराग मिल सके.  डायरी से मुझे उनके पैतृक गाँव का पता मिला. जो बिहार राज्य के समस्तीपुर जिले के  विद्यापति  नगर का  एक गाँव मलकलीपुर था. 
      अब वक्त था, कोई समस्तीपुर का कोई मिले जिससे आगे कि जानकारी हासिल की जाये. ऐसे में फेसबुक मित्र निखिल आनंद गिरि काम आये जो समस्तीपुर के है. अभी हाल में ही उनकी शादी में समस्तीपुर जाना हुआ. शादी के बाद हम लोग  उन्हें ढूढ़ने के लिए उनके पैतृक गाँव मलकलीपुर  पहुँचे. हम लोग विद्यापति नगर एक स्थानीय व्यक्ति को लेकर उनके गाँव मलकलीपुर पहुँचे. कहते हैं ना."जब कोई अच्छा काम करो तो किस्मत भी साथ देती है. पहला ही घर, जहाँ हम पूछने के लिए रुके सौभाग्य से वहीँ उनका ही घर निकला. लेकिन घर पर सिर्फ उनकी बहू और उनकी बहन रहती हैं. पूछने पर पता चला कि वे अब नागपुर में शिफ्ट हो गये हैं.  हमने वहाँ से उनका मोबाइल नंबर लिया और पिता जी से बात करायी. एक सिल्वर जुबली के बाद दोनों मित्र बातें कर के बहुत खुश हैं.

सोमवार, फ़रवरी 27, 2012

बिहार यात्रा वाया समस्तीपुर

        बिहार(समस्तीपुर) से लौटे २ दिन हो गये हैं. पर अभी समस्तीपुर की ही यादों में खोया हूँ , वहाँ की बोली, वहाँ के लोग, और वहाँ के लोंगो  से मिला  असीम प्यार मुझे हर पल याद आ रहा है.
समस्तीपुर एक भीड़-भाड़ वाला शहर, मगर लोंगो की जिंदगी में वो भाग-दौड़ नहीं जो अन्य शहरों  में देखने को मिलती है. बड़े ही शांत और हँसमुख लोग जो पूरी तरह से खुल के बातें करते हैं.
समस्तीपुर  की बोली में एक अलग तरह की मिठास भरी है जो आपके मन को मोह लेती है. हिंदी हो या अंग्रेजी, यहाँ अधिकतर शब्दों में "ऐ" का उच्चारण होता है जिसे सुन कर आपको "बहुते अच्छा लगेगा."
जैसे कार धुलाई करने वाला कार को धोने के बाद बोला -"देखिये ना, अब करवा का लूकवे(LOOK) चेंज हो गया"
एक सज्जन घड़ी देख कर बोले- "अभी तो नाइने(NINE) बज रहा है."
'व' का उच्चारण 'भ' में किया जाता है अर्थात यहाँ वेलकम नहीं "भेलकम" किया जाता है और यहाँ "दिल भाले दुल्हनिया ले जाते हैं."
'ड़'  का उच्चारण 'र' में किया जाता है मतलब "थोरा थोरा खाइए ना" 
कहीं कहीं तो अंग्रेजी के कुछ उच्चारण तो पूरी तरह से भिन्न सुनने को मिल  जाते हैं पर बातें आपको समझ में आ ही जाती हैं. 
जैसे कार धुलाई करने वाला बोला- "देखिया ना, धुलने के बाद कार आउटे(ODD) नहीं लग रही है."
और एक सज्जन निखिल से बात करते हुए बोले "कभी हमें जी टीवी का  प्रोसेसर(PRODUCER ) से मिलवाइए."
सबसे दिलचस्प मुझे ये लगी कि‍ यहाँ के लोंगो की बातो में "मैं" कहीं नजर नहीं आया यहाँ सभी "हम" लगा कर बाते करते हैं जो दिल को छू लेता है.
समस्तीपुर की मक्के की रोटी और मछली चावल अभी भी याद आ रहे  हैं. याद भी क्यूँ ना आये पहली बार जो मक्के की रोटी खाने को मिली थी.

रविवार, फ़रवरी 26, 2012

निखिल आनंद गिरि से मुलाकात

      निखिल आनंद गिरि , एक जाने माने ब्लॉगर और युवा हिंदी  कवि, जिनका ब्लॉग बुरा-भला मैं  लगभग पौने 2 सालों  से पढ़ता  आ रहा हूँ. मुझे इनकी कवितायेँ पढ़ना बहुत ही अच्छा लगता है. मुझे इनसे मिलने की बड़ी तम्मना थी. मेरी ये तम्मना  पूरी हुई, उन्ही के शहर समस्तीपुर में, उनकी शादी के आमंत्रण पर-
       निखिल आनंद गिरि की  रचनायें जितनी ही खुबसूरत और प्रभावी होती हैं, उतने ही सरल और प्रभावी इंसान हैं वो. उनसे मिलकर मैं अपने आप को बहुत खुशनसीब मानता हूँ. जिस अगली सुबह मुझे वहां से लौटना था उस रात हम उनकी कविताओं, कहानीओं पर ढेर सारी बाते करते रहे. बातों ही बातों में उन्होंने अपनी एक ग़ज़ल "इक भरम के वास्ते " सुनाई जो बड़ी ही खुबसूरत लगी. उसने बाते करके काफी मज़ा आ रहा था  तभी दीदी आ गयी और बोली "निखिल सोना नहीं है क्या ?? 11 बज रहे हैं..!!" इसके बाद निखिल जी "गुड नाईट" कह कर  सोने चले गये. "आखिर उनका भी कोई इंतजार  कर रहा था."
     और मैं उन अधूरी बातों को समेटते हुए  सोच रहा था कि आज 11 इतना जल्दी कैसे बज गया...!