सोमवार, फ़रवरी 27, 2012

बिहार यात्रा वाया समस्तीपुर

        बिहार(समस्तीपुर) से लौटे २ दिन हो गये हैं. पर अभी समस्तीपुर की ही यादों में खोया हूँ , वहाँ की बोली, वहाँ के लोग, और वहाँ के लोंगो  से मिला  असीम प्यार मुझे हर पल याद आ रहा है.
समस्तीपुर एक भीड़-भाड़ वाला शहर, मगर लोंगो की जिंदगी में वो भाग-दौड़ नहीं जो अन्य शहरों  में देखने को मिलती है. बड़े ही शांत और हँसमुख लोग जो पूरी तरह से खुल के बातें करते हैं.
समस्तीपुर  की बोली में एक अलग तरह की मिठास भरी है जो आपके मन को मोह लेती है. हिंदी हो या अंग्रेजी, यहाँ अधिकतर शब्दों में "ऐ" का उच्चारण होता है जिसे सुन कर आपको "बहुते अच्छा लगेगा."
जैसे कार धुलाई करने वाला कार को धोने के बाद बोला -"देखिये ना, अब करवा का लूकवे(LOOK) चेंज हो गया"
एक सज्जन घड़ी देख कर बोले- "अभी तो नाइने(NINE) बज रहा है."
'व' का उच्चारण 'भ' में किया जाता है अर्थात यहाँ वेलकम नहीं "भेलकम" किया जाता है और यहाँ "दिल भाले दुल्हनिया ले जाते हैं."
'ड़'  का उच्चारण 'र' में किया जाता है मतलब "थोरा थोरा खाइए ना" 
कहीं कहीं तो अंग्रेजी के कुछ उच्चारण तो पूरी तरह से भिन्न सुनने को मिल  जाते हैं पर बातें आपको समझ में आ ही जाती हैं. 
जैसे कार धुलाई करने वाला बोला- "देखिया ना, धुलने के बाद कार आउटे(ODD) नहीं लग रही है."
और एक सज्जन निखिल से बात करते हुए बोले "कभी हमें जी टीवी का  प्रोसेसर(PRODUCER ) से मिलवाइए."
सबसे दिलचस्प मुझे ये लगी कि‍ यहाँ के लोंगो की बातो में "मैं" कहीं नजर नहीं आया यहाँ सभी "हम" लगा कर बाते करते हैं जो दिल को छू लेता है.
समस्तीपुर की मक्के की रोटी और मछली चावल अभी भी याद आ रहे  हैं. याद भी क्यूँ ना आये पहली बार जो मक्के की रोटी खाने को मिली थी.

3 टिप्‍पणियां:

  1. बाह! भाई... इहाँ भी हम ही सब कहते हैं.. लेकिन तू का प्रयोग होता है..

    मछली छोड़ के बाकी सब अच्छा लगा.. ;)

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  2. :)क्‍या करें.... कभी-कभी मौकाहारी बन जाता हूँ ऐसे मामलों में....

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  3. थोड़ा और विस्तार से लिखना था इसको...कोशिश करो दोबारा यादों को ज़िंदा करने की...फेसबुक पर भी शेयर करो और बताओ कि पहली बार बिहार आना कैसा रहा...

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