सोमवार, अगस्त 13, 2012

कुछ कविता सी..


आज कुछ कहने को जी चाहता है,
इन फुहारोँ मे भीगने को जी चाहता है.
तुम जो ना हो साथ मेरे,
बस अब इन हवाओँ से खेलने को जी चाहता है.


शायद तुम्हे याद होगीँ...
वो बचपन की बारिशेँ...जब हम साथ भीगा करते थे...
बारिश से हुई गीली धूल को,
नाजुक सी हथेली पर थाम कर,
मुझ पर उड़ाने की तुम्हारी नादान कोशिशेँ..
अब तो बस ये याद कर मुस्कराने को जी चाहता है...